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एक मंच पर साथ, मैदान में आमने-सामने! कांग्रेस और ममता के रिश्तों पर उठे सवाल

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 नई दिल्ली

INDIA ब्लॉक की बैठक से एक तस्वीर आई है, जिसमें ममता बनर्जी और सोनिया गांधी गले मिल रही हैं. ममता बनर्जी का चेहरा सामने होने के कारण भाव का पता चल रहा है, लेकिन सोनिया गांधी के मन में क्या चल रहा है, कैमरे के सामने नहीं होने के कारण नहीं मालूम। 

मीटिंग में ममता बनर्जी को सोनिया गांधी की ठीक बगल में सीट दी गई थी. सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ बैठी हैं. मल्लिकार्जुन खड़गे के पास राहुल गांधी और अखिलेश यादव को सीट मिली थी. ममता बनर्जी के लिए मुस्कुराने का मौका सिर्फ उस हाल के अंदर था, जहां मीटिंग हो रही थी. बाहर तो जैसे बर्बादी की सुनामी आई हुई थी. पश्चिम बंगाल में राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे के बीच दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस के सांसद बीजेपी नेता भूपेंद्र यादव से मिलने पहुंचे थे – और गौर करने वाली बात यह थी कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी मौजूद थे। 

ममता बनर्जी के चेहरे पर थोड़े सुकून के जो भाव थे, उसकी वजह कांग्रेस से मिल रहा सपोर्ट समझा जा सकता है. मुश्किल यह है कि ममता बनर्जी को कांग्रेस से सपोर्ट सिर्फ दिल्ली में ही मिल रहा है, पश्चिम बंगाल में नहीं. ऐसा क्यों?

दिल्ली में दोस्ती, कोलकाता में दुश्मनी
2024 के आम चुनाव से पहले राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर निकले थे. पश्चिम बंगाल में राहुल गांधी के दाखिल होने से ठीक पहले ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के अकेले दम पर लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी थी. मतलब, कांग्रेस के साथ कोई चुनावी गठबंधन नहीं. लेकिन, इंडिया ब्लॉक छोड़ने जैसी कोई बात नहीं कही गई थी. नीतीश कुमार की तरह. तब राहुल गांधी के बिहार पहुंचने से पहले नीतीश कुमार महागठबंधन छोड़कर एनडीए में शामिल हो गए थे. चुनावों के दौरान ममता बनर्जी का व्यवहार भी नीतीश कुमार जैसा ही था. ममता बनर्जी का स्टैंड अघोषित था। 

ममता बनर्जी ने अपने जानी सियासी दुश्मन कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी के खिलाफ गुजरात से लाकर पूर्व क्रिकेटर इरफान पठान को मैदान में उतार दिया. अधीर रंजन चौधरी चुनाव हार गए, और कांग्रेस ने एक सीट गंवा दी. कांग्रेस ने बंगाल में एक सीट भले खो दी, लेकिन बाकी राज्यों में 2014 और 2019 के मुकाबले बेहतरीन प्रदर्शन किया. हां, अधीर रंजन चौधरी चुनाव जीत गए होते तो कांग्रेस का शतक पूरा हो गया होता. चुनावी गठबंधन की उम्मीद न होने के बावजूद कांग्रेस नेता ममता बनर्जी के मामले में हमलावर होने से परहेज करते देखे गए. ममता बनर्जी के व्यवहार में तो कोई तब्दीली नहीं आई, लेकिन राहुल गांधी को पूरा संयम बरतते देखा गया। 

तृणमूल कांग्रेस ने भी 2019 के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करते हुए बीजेपी को पांच साल बाद कम ही सीटों पर समेट दिया. कांग्रेस की हार के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता भी बन गए. लेकिन, स्पीकर के चुनाव में कांग्रेस के विपक्ष की तरफ से अपना उम्मीदवार उतार देने पर ममता बनर्जी खफा हो गई। 

तब ममता बनर्जी की नाराजगी दूर करने के लिए राहुल गांधी ने खुद फोन किया, और फिर वो मान भी गईं. बाद के दिनों में ममता बनर्जी अपनी जरूरत के हिसाब से इंडिया ब्लॉक से कभी बाहर तो कभी भीतर होने का एहसास दिलाती रहीं. और, पश्चिम बंगाल चुनाव आते आते कांग्रेस के लिए नो-एंट्री की फिर से घोषणा कर दी. लेकिन, उस स्थिति में भी ममता बनर्जी चाहती थीं कि कांग्रेस मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने की पहल करे. हां, महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन बिल के खिलाफ ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ डटकर खड़ी रहीं, और बीजेपी की केंद्र सरकार का बिल गिर गया। 

ममता बनर्जी को भी अब ये तो समझ में आ गया है कि फिलहाल कांग्रेस के साथ मिलकर चलने में ही भलाई है, वरना पश्चिम बंगाल में तो जो हो रहा है, देश देख ही रहा है. कांग्रेस के साथ जो होना था, वह तो 2014 में ही हो गया था. जो कुछ बचा था, वह 2019 में हो गया. राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार गए. अगर वायनाड से चुनाव नहीं लड़े होते तो लोकसभा से दूर ही रहना पड़ा होता. कुछ दिनों के लिए तो संसद की सदस्यता भी गंवानी पड़ी थी। 

दिल्ली में तो नहीं, लेकिन पश्चिम बंगाल चुनाव कैंपेन के दौरान राहुल गांधी ने कुछ दिन के लिए अपनी सदस्यता चले जाने के साथ साथ अपने खिलाफ चल रहे मुकदमों का जोर देकर जिक्र किया, और पूछा – क्या ममता बनर्जी के साथ ये सब होता है?

इंडिया ब्लॉक की मीटिंग से पहले दिल्ली पहुंचते ही ममता बनर्जी ने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की. ममता बनर्जी हमेशा ही अरविंद केजरीवाल को विपक्षी खेमे में साथ रखने की पक्षधर रही हैं. विपक्ष की बैठकों में भी ममता बनर्जी को अरविंद केजरीवाल की पैरवी करते देखा गया है. लेकिन, राहुल गांधी का व्यवहार ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल से एक जैसा ही देखने को मिला है. 2025 का दिल्ली विधानसभा चुनाव और हालिया पश्चिम बंगाल चुनाव मिसाल हैं – राहुल गांधी ममता बनर्जी के खिलाफ उन्हीं मुद्दों के साथ हमलावर दिखे, जिन मुद्दों के साथ दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ थे। 

बंगाल में कांग्रेस बनाम तृणमूल कांग्रेस
जैसे दिल्ली चुनाव में राहुल गांधी ने अरविंद केजरीवाल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और शीशमहल के बहाने हमला बोला था, पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी ही उनके निशाने पर देखी गईं. पश्चिम बंगाल में राहुल गांधी ने ममता बनर्जी पर भ्रष्टाचार और बीजेपी की मददगार होने का भी इल्जाम लगाया था। 

2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले तो राहुल गांधी ने अधीर रंजन चौधरी को भेजा ही खास मकसद से था. तब अधीर रंजन चौधरी लोकसभा में कांग्रेस और विपक्ष के नेता हुआ करते थे. लेकिन, चुनाव से पहले उनको पश्चिम बंगाल कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया था. और, इस बार के चुनाव में भी बंगाल यूनिट को खुली छूट दी गई थी. अधीर रंजन को तो पश्चिम बंगाल अध्यक्ष पद से पहले ही हटा दिया गया था, लेकिन मोर्चे पर वो भी डटे हुए थे – और अब भी वैसे ही आक्रामक बने हुए हैं। 

राहुल गांधी ने बाकी राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार तो नहीं किया, लेकिन जमकर बरसे जरूर. एक रैली में राहुल गांधी कह रहे थे, केवल कांग्रेस पार्टी बीजेपी से लड़ती है… मैं बेल पर हूं… मेरा घर छीन लिया. लोकसभा की सांसदी छीन ली, मेरे ऊपर 36 मुकदमे हैं. हर 10 से 15 दिन में कहीं न कहीं मुकदमा लड़ने जाना पड़ता है… मैं आपसे पूछना चाहता हूं… ममता जी के खिलाफ नरेंद्र मोदी ने कितने मुकदमे कराए हैं?

हालांकि, चुनाव नतीजे आ जाने के बाद राहुल गांधी का भी रुख बदल गया था. सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में राहुल गांधी ने कुछ कांग्रेस नेताओं के खुश होने पर नाखुशी जताई थी. और, ममता बनर्जी के निष्पक्ष मतदान पर सवाल उठाने का समर्थन भी किया था. और, अब इंडिया ब्लॉक का नजारा तो देखा ही जा रहा है। 

राहुल गांधी यह भी नहीं भूले होंगे कि कैसे हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव हार जाने के बाद ममता बनर्जी ने इंडिया ब्लॉक में उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाए थे, और कांग्रेस को चैलेंज करते हुए खुद लीड करने की पेशकश कर डाली थी. और, तब लालू यादव जैसे नेताओं ने बनर्जी का सपोर्ट भी किया था. लेकिन, दिल्ली चुनाव हार जाने के बाद अरविंद केजरीवाल, बिहार की हार के बाद तेजस्वी यादव और बंगाल की हार के बाद ममता बनर्जी सभी एक ही मोड़ पर पहुंच गए हैं. कांग्रेस अपनी जगह पर बनी हुई है. बल्कि, विधानसभा चुनावों के बाद केरल में सरकार भी बना चुकी है. विपक्षी खेमे में सिर्फ कांग्रेस के पास चार राज्यों में सरकार है, और झारखंड में हेमंत सोरेन हैं। 

राहुल गांधी ने ममता बनर्जी की हार पर खुश होने के लिए भले ही कांग्रेस नेताओं को फटकार लगाई हो, लेकिन अधीर रंजन बंगाल की धरती से ममता बनर्जी को फिर से कांग्रेस में शामिल होकर तृणमूल कांग्रेस का विलय कर लेने की सलाह दे डाली है. ममता बनर्जी को भी समझ में आ ही रहा होगा कि कांग्रेस नेतृत्व बंगाल में अलग और दिल्ली में अलग व्यवहार कर रहा है, जबकि बीजेपी इस मामले में एक जैसा सलूक कर रही है। 

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